क्या आपके मुँह में कोई छाला है जो कई हफ्तों से ठीक नहीं हो रहा? या गाल के अंदर सफेद-लाल धब्बा दिख रहा है? या मुँह पहले जितना नहीं खुलता?
ऐसी छोटी-छोटी बातें अक्सर लोग टाल देते हैं। लेकिन कई बार यही मुँह के कैंसर की पहली आहट होती है।
अच्छी बात यह है कि मुँह का कैंसर उन गिनी-चुनी बीमारियों में से है जिसे आप ख़ुद आईने में देख सकते हैं। और अगर शुरुआत में ही पकड़ लिया जाए, तो यह पूरी तरह ठीक हो सकता है।
इस लेख में हम आसान भाषा में बताएँगे कि क्या देखना है, कब डरना है, कब नहीं, और कब डॉक्टर के पास जाना है।
| सबसे ज़रूरी एक बात मुँह का कोई भी छाला, घाव, धब्बा या गांठ जो 3 हफ्ते (21 दिन) में अपने आप ठीक न हो — उसे डॉक्टर को ज़रूर दिखाएँ। दर्द न होने का मतलब यह नहीं कि सब ठीक है। शुरुआती मुँह का कैंसर ज़्यादातर दर्द नहीं करता। |
हमारा शरीर लाखों छोटी-छोटी कोशिकाओं से बना है। ये पुरानी होकर मरती हैं और नई बनती हैं — यह एक सामान्य प्रक्रिया है।
कभी-कभी मुँह के अंदर की कुछ कोशिकाएँ बेकाबू होकर बढ़ने लगती हैं और एक गांठ या घाव बना देती हैं। इसी को मुँह का कैंसर कहते हैं। अंग्रेज़ी में इसे ओरल कैंसर (Oral Cancer) कहा जाता है।
भारत में यह कैंसर बहुत आम है — और इसका सबसे बड़ा कारण तंबाकू, गुटखा और सुपारी है। पुरुषों में कैंसर से होने वाली मौतों में मुँह का कैंसर सबसे आगे है।
शुरुआत में यह बीमारी चुपचाप आती है। न तेज़ दर्द, न बुख़ार। इसीलिए लोग महीनों टाल देते हैं।
नीचे दिए लक्षण ध्यान से पढ़ें। इनमें से कोई भी दिखे तो जाँच करवाएँ।
यह सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है। नीचे दी तालिका से आपको अंदाज़ा लग जाएगा।
| बात | आम छाला | चिंता वाला घाव |
| दर्द | काफ़ी दर्द होता है | अक्सर दर्द नहीं होता |
| कितने दिन रहता है | 7 से 10 दिन | 3 हफ्ते से ज़्यादा, या बढ़ता जाता है |
| छूने में कैसा | नरम | सख़्त, किनारे उभरे हुए |
| दिखने में | गोल, साफ़ किनारे | टेढ़ा-मेढ़ा, बीच में गड्ढा |
| ख़ून आना | आमतौर पर नहीं | हल्का छूने पर भी ख़ून आ सकता है |
| क्या करें | इंतज़ार कर सकते हैं | तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ |
ध्यान दें: यह तालिका सिर्फ़ समझने के लिए है। असली फ़र्क सिर्फ़ जाँच से पता चलता है। ख़ुद अंदाज़ा लगाकर बैठे न रहें।
यह सबसे बड़ा कारण है। जब आप गुटखा या खैनी गाल में दबाकर घंटों रखते हैं, तो उसका रस लगातार मुँह की परत को नुकसान पहुँचाता रहता है।
कई साल तक यह चलता रहे तो कोशिकाएँ बिगड़ने लगती हैं। यही आगे चलकर कैंसर बन सकता है।
यह सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। बहुत से लोग तंबाकू छोड़कर सादा सुपारी या तंबाकू रहित पान मसाला खाने लगते हैं और समझते हैं कि अब कोई ख़तरा नहीं।
सच यह है कि सुपारी अपने आप में नुक़सानदेह है। दुनिया की सबसे बड़ी कैंसर रिसर्च संस्था (IARC) ने सुपारी को उन चीज़ों की सूची में रखा है जिनसे इंसानों में कैंसर होना साबित हो चुका है।
सुपारी ही मुँह सख़्त होने और कम खुलने वाली बीमारी की सबसे बड़ी वजह है।
धूम्रपान से मुँह, गले और फेफड़ों — तीनों को नुकसान होता है। शराब अकेले भी ख़तरा बढ़ाती है।
और अगर कोई तंबाकू भी लेता है और शराब भी, तो ख़तरा जुड़ता नहीं, कई गुना बढ़ जाता है।
मुँह का कैंसर अचानक नहीं होता। इससे पहले शरीर कई महीनों, कभी-कभी सालों तक संकेत देता है। इन्हें पहचान लिया जाए तो कैंसर होने से पहले ही रोका जा सकता है।
यह सुपारी और पान मसाला खाने वालों में बहुत आम है। इसे ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस कहते हैं।
इसमें क्या होता है:
यह बीमारी एक बार हो जाए तो पूरी तरह वापस नहीं जाती। लेकिन अगर आप सुपारी बंद कर दें, तो यह आगे बढ़ना रुक जाती है और कैंसर का ख़तरा काफ़ी कम हो जाता है।
सफेद धब्बा (ल्यूकोप्लाकिया) और लाल धब्बा (एरिथ्रोप्लाकिया) — ये दोनों चेतावनी हैं। इनमें से लाल धब्बा ज़्यादा गंभीर माना जाता है।
अच्छी बात यह है कि इस अवस्था में इलाज बहुत आसान और सस्ता होता है। तंबाकू छोड़ने भर से कई मामलों में सुधार दिखने लगता है।
इसके लिए बस एक आईना, अच्छी रोशनी और साफ़ हाथ चाहिए। महीने में एक बार यह ज़रूर करें।
कहीं भी कुछ नया, अलग या 3 हफ्ते से बना हुआ दिखे तो डेंटिस्ट को दिखाएँ।
बहुत से लोग इसी डर से नहीं जाते कि पता नहीं क्या होगा। असल में यह बहुत आसान होता है।
| “बायोप्सी करवाने से कैंसर फैल जाता है” — यह बात पूरी तरह ग़लत है। यह सिर्फ़ एक अफ़वाह है, जिसकी वजह से हज़ारों लोग इलाज में देर कर देते हैं। बायोप्सी ही एकमात्र तरीक़ा है जिससे पक्का पता चलता है कि गांठ या घाव ख़तरनाक है या नहीं। |
इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी कितनी फैली है। मुख्य रूप से तीन तरीक़े हैं, और कई बार इन्हें मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है।
शुरुआती अवस्था में अक्सर सिर्फ़ एक छोटा ऑपरेशन ही काफ़ी होता है। जितनी देर से पता चलेगा, इलाज उतना ही बड़ा और लंबा होगा।
यह बात बहुत कम लोगों को पता होती है। रेडिएशन शुरू करने से पहले डेंटिस्ट से पूरी जाँच करवाएँ और ज़रूरी दांतों का इलाज पहले ही करवा लें।
अगर बाद में दांत निकलवाना पड़े, तो जबड़े की हड्डी में गंभीर दिक्कत हो सकती है जो ठीक होने में बहुत समय लेती है।
| तंबाकू छोड़ना है? सरकार की मुफ़्त मदद लें भारत सरकार की राष्ट्रीय तंबाकू क्विटलाइन पर कॉल करें: 1800-11-2356 यह पूरी तरह मुफ़्त है। हिंदी सहित 16 भाषाओं में ट्रेंड काउंसलर आपसे बात करते हैं और छोड़ने की योजना बनाकर समय-समय पर फ़ोन करके हाल पूछते हैं। अब तक 2 लाख से ज़्यादा लोग इस सेवा की मदद से तंबाकू छोड़ चुके हैं। |
| जो लोग कहते हैं | असली बात |
| “तंबाकू नहीं है, सिर्फ़ सुपारी है, कोई दिक्कत नहीं” | सुपारी ख़ुद नुक़सानदेह है और मुँह सख़्त होने की सबसे बड़ी वजह है |
| “छाला है, अपने आप ठीक हो जाएगा” | 3 हफ्ते से ज़्यादा रहे तो जाँच ज़रूरी है |
| “दर्द नहीं है तो कैंसर नहीं होगा” | शुरुआती मुँह का कैंसर ज़्यादातर दर्द नहीं करता |
| “बायोप्सी से कैंसर फैल जाता है” | बिल्कुल ग़लत — यह पता लगाने का एकमात्र पक्का तरीक़ा है |
| “मुँह का कैंसर लाइलाज है” | शुरुआत में पकड़ा जाए तो पूरी तरह ठीक हो सकता है |
| “कैंसर छूने या साथ खाने से फैलता है” | कैंसर छूत की बीमारी नहीं है |
| “देसी दवा या जड़ी-बूटी से ठीक हो जाएगा” | इसका कोई प्रमाण नहीं; इसमें लगा समय ही सबसे बड़ा नुकसान करता है |
| “20 साल खाया है, अब छोड़ने से क्या होगा” | जिस दिन छोड़ेंगे, उसी दिन से ख़तरा घटना शुरू हो जाता है |
सबसे आम पहला लक्षण है मुँह का ऐसा छाला या घाव जो 3 हफ्ते में ठीक न हो और जिसमें आमतौर पर दर्द न हो। मुँह में सफेद या लाल धब्बा भी शुरुआती संकेत हो सकता है।
हाँ, अगर शुरुआत में पता चल जाए। शुरुआती अवस्था में इलाज के नतीजे बहुत अच्छे होते हैं और ज़्यादातर लोग सामान्य ज़िंदगी जीते हैं। देर से पता चलने पर इलाज लंबा और मुश्किल हो जाता है।
शुरुआत डेंटिस्ट से करें। डेंटिस्ट ही सबसे पहले मुँह की गड़बड़ी पहचानते हैं। अगर उन्हें कुछ संदेह होगा, तो वे आपको सही विशेषज्ञ के पास भेज देंगे। सीधे कैंसर अस्पताल जाने की ज़रूरत नहीं है।
मुँह की शुरुआती जाँच 5 से 10 मिनट में हो जाती है और यह बहुत सस्ती होती है। अगर आगे जाँच की ज़रूरत पड़े, तो डॉक्टर आपको पहले ही बता देंगे कि क्या करना है और कितना ख़र्च होगा।
छोड़ने के दिन से ही ख़तरा घटना शुरू हो जाता है और साल दर साल कम होता जाता है। किसी भी उम्र में छोड़ने का फ़ायदा होता है, चाहे आपने कितने भी साल खाया हो।
पूरी तरह पहले जैसी नहीं होती, लेकिन सुपारी बंद करने, दवा, मुँह की कसरत और कुछ मामलों में छोटे इलाज से काफ़ी सुधार आ सकता है। सबसे ज़रूरी है कि इसे और बढ़ने से रोका जाए।
ज़्यादातर मामले आदतों से होते हैं, ख़ानदानी नहीं। हालाँकि परिवार में किसी को मुँह या गले का कैंसर रहा हो, तो नियमित जाँच करवाते रहना समझदारी है।
हाँ, इसलिए इलाज के बाद डॉक्टर द्वारा बताए गए समय पर जाँच करवाते रहना बहुत ज़रूरी है। सबसे बड़ी बात — इलाज के बाद तंबाकू बिल्कुल न लें, वरना दोबारा होने का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है।
हाँ। आयुष्मान भारत योजना के तहत पात्र परिवारों को कैंसर के इलाज सहित सालाना 5 लाख रुपये तक की सुविधा मिलती है। सरकारी कैंसर अस्पतालों में भी इलाज बहुत कम ख़र्च में होता है। अस्पताल के हेल्प डेस्क से ज़रूर पूछें।
हाँ। तंबाकू सबसे बड़ा कारण है, पर एकमात्र नहीं। साल में दो बार डेंटल जाँच में मुँह की पूरी जाँच शामिल होनी चाहिए। यह कुछ ही मिनट लेती है।
YouDent Hospital जयपुर का NABH प्रमाणित डेंटल हॉस्पिटल है। NABH भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे ऊँची गुणवत्ता प्रमाणिकता है, जो जयपुर के बहुत कम डेंटल क्लिनिक के पास है।
डॉ. राजेश कुमार गुप्ता (BDS, MDS) के 25 वर्षों से अधिक के अनुभव और 10 से ज़्यादा विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम के साथ, यहाँ अब तक 1 लाख से अधिक मरीज़ों का इलाज हो चुका है।
| साफ़ बात: YouDent एक डेंटल हॉस्पिटल है, कैंसर अस्पताल नहीं। हमारा काम है समय रहते पहचानना, ज़रूरी जाँच की सलाह देना और आपको सही विशेषज्ञ तक पहुँचाना। अगर जाँच में कुछ गंभीर मिलता है, तो हम आपको मान्यता प्राप्त कैंसर विशेषज्ञ के पास भेजते हैं — और आपके दांतों की देखभाल इलाज के दौरान भी जारी रखते हैं। |
अगर इस पूरे लेख से आपको सिर्फ़ तीन बातें याद रखनी हों, तो ये हैं:
अगर आपके मन में कोई शक है, तो उसे लेकर बैठे न रहें। एक बार दिखा लेना हमेशा बेहतर है।
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